विश्व विकलांगिता दिवस (03 दिसंबर) पर विशेष,समावेश आजीविका की रणनीतियां

प्रत्येक वर्ष 03 दिसंबर को विश्व विकलांग दिवस मनाया जाता है। उस दिन केन्द्र समेत हिन्दुस्तान के विभिन्न प्रांतों की सरकारें अपंगों के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाओं की झड़ी लगाती है। कोई भी प्रदेश इससे अछूता नहीं है। देश भर में दिसंबर के पहले हफ्ता में बाकायदे ‘विकलांग सप्ताह’ ही आयोजित करने की मुनादी हो चुकी है। इस मौके पर सरकार हाथ, पैर, देह आदि से लाचार लोगों की बेहतरी वास्ते जो ऐलान करती है, सही मायने में उसपर अमल होता है? लिहाजा, विकलांगों के जेहन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जो बच्चा रोता नही, मां उसे दूध् नहीं पिलाती? दुनियाभर में साठ करोड़ लोग किसी न किसी तरह की विकलांगिता से पीड़ित हैं। उनमें से सत्तर प्रतिशत यानी 42 करोड़ लोग विकासशील देशों में रहते हैं। विकलांगताग्रस्त व्यक्तियों में से अस्सी प्रतिशत गरीब हैं। प्रत्येक पांच में से एक यानी बीस प्रतिशत निर्धनतम लोग विकलांग हैं। सामाजिक पदानुक्रम में विकलांगताग्रस्त लोग सबसे निचली पायदान पर आते हैं। ये साऱे तथ्य भारत के मामले में भी सच है। एक सीमित अनुमान के मुताबिक भारत में तकरीबन छह करोड़ लोग किसी न किसी तरह की विकलांगता से ग्रस्त हैं। यह संख्या दुनिया के विकलांगताग्रस्त व्यक्तियों की संख्या का दस प्रतिशत और विकासशील देशों में मौजूद व्यक्तियों का चौदह प्रतिशत है। गरीबी विकलांगता का परिणाम भी है और कारण भी। विकलांगता के ग्रस्त व्यक्तियों के गरीब पाए जाने की संभावना काफी ज्यादा रहती है। दूसरी तरफ गरीबों के विकलांग हो जाने की संभावना भी सबसे ज्यादा रहती है क्योंकि वह विकलांगता की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लागतों को वहन नहीं कर सकते। भारत में रहने वाले 82 प्रतिशत विकलांगताग्रस्त व्यक्ति गरीबी की रेखा से नीचे हैं। देश की कुल श्रम शक्ति में उनका हिस्सा एक प्रतिशत से भी कम है। देश के विकलांग व्यक्तियों में से केवल तीन प्रतिशत ऐसे हैं जो कोई सार्थक और लाभदायक व्यवसाय कर पा रहे हैं। विकलांगिता से ग्रस्त व्यक्तियों में से अस्सी प्रतिशत देश के ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। उन्हें संपत्ति रोजगार, आजीविका और आय के अधिकारों से वंचित रखा जाता है। छत्तीसगढ़, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय में किए गए अध्ययन से पता चलता है कि इन राज्यों में विकलांगता से ग्रस्त केवल छह प्रतिशत लोगों के नाम पर ही कोई संपत्ति है। ग्रामीण इलाकों में विकलांगता से ग्रस्त अस्सी प्रतिशत से ज्यादा लोग खेतिहर मजदूर हैं और इसी से उनकी आजीविका चलती है। विकलांगता से ग्रस्त व्यक्तियों में जो लोग दिहाड़ी मजदूरी करते हैं उन्हें गैर विकलांग दिहाड़ी मजदूरों के मुकाबले कम वेतन मिलता है। उन्हें सिर्फ उसी सीजन में काम मिलता है जब काम  बहुत ज्यादा रहता है। बाकी सीजनों में उन्हें कोई काम नहीं मिल पाता। फलस्वरूप वह और ज्यादा शक्तिहीत हो जाते हैं। ऐसे में उनकी गरीबी, भूखमरी, वंचना और अपमान भी बढ़ता जाता है। विकलांगता से ग्रस्त व्यक्तियों को या तो लोग काम पर रखना नहीं चाहते या उन्हें कम वेतन पर नौकरी देती हैं जिससे रोजगार का उनका अधिकार बुरी तरह सीमित हो जाता है। विकास के क्षेत्र में आजीविका संबंधी रणनीति का सवाल निरंतर लोकप्रिय होता जा रहा है इस पद्धति को गरीबी और भुखमरी दूर करने की एक महत्वपूर्ण रणनीति के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। आर्थिक सशक्तीकरण गरीबों और हाशियाई तबकों के मानवाधिकारों की रक्षा तथा उनके समग्र विकास की एक प्रभावी पद्धति साबित हुई है। विकलांगता से ग्रस्त व्यक्ति भी इसका अपवाद नहीं है। अगर ये रणनीतियां गरीबों और हाशियाई तबको के मामले में प्रभावी साबित हो सकती है तो वह विकलांगता से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए भी निश्चय ही लाभदायक साबित होंगी। परंपरागत पद्धतियां और व्यवस्थाएं इतना प्रभावी और प्रभावोत्पादक नहीं रहती है। परंपरागत पद्धतियों में रूढ़ छवियों, नकारात्मक मूल्यों और निर्भरता की मनोदशा को बढ़ावा मिलता है। आज ऐसी वैकल्पिक पद्धतियों और रणनीतियों को लागू करना जरूरी है जो विकास के क्षेत्र में सामान्य रूप से प्रभावी और सफल साबित हो चुकी है। दरअसल विकलांगता से ग्रस्त व्यक्ति भी इतने सक्षम हैं कि वह अपनी विकलांगता, दिलचस्पी और रुझानों के आधार पर किसी भी तरह का रोजगार कर सकते हैं। यह बात सौ फीसदी सही है क्योंकि जो काम एक व्यक्ति के लिए संभव है वह किसी और के लिए भी संभव हो सकता है, जो चीज विकलांगता से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए संभव नहीं थी वह आज संभव है और जो संभव नहीं है हो सकता है वह कल संभव हो जाए। विकलांगता से ग्रस्त व्यक्ति भी खेती बाड़ी, रेशम कीट पालन, बागवानी, बढ़ई, लोहार, बुनकर, कुम्हार, दुकानदार, दर्जी, बिजली मिस्त्री, इलेक्ट्रॉनिक कारीगर, पशुपालक और अन्य ग्रामीण व्यवसायों में संलग्न है जहां तक काम का सवाल है कि विकलांगता से ग्रस्त व्यक्तियों और अन्य व्यक्तियों के बीच कोई फर्क नहीं दिखाई नहीं दिया। विकलांगता से ग्रस्त व्यक्ति भी उतनी ही दक्षता से अपना काम करते हैं जिस तरह दूसरे लोग करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 10 दिसंबर 1948 को पारित की गई सार्वभौमिक मानवाधिकार उद्घोषणा पहला अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज है जिसमें प्रतिष्ठा एवं अधिकारों के क्षेत्र में सार्वभौमिक मानवीय समानता का आश्वासन दिया गया है। तब से अब तक विभिन्न घोषणाओं और उपसंधिय़ों के जरिए उसकी तीस धाराओं की विस्तारपूर्वक व्याख्या की जा चुकी है। यूरोपीय परिषद, संयुक्त राष्ट्र महासभा, संयुक्त राष्ट्र की अन्य शाखाएं, ओएएस तथा अन्य संस्थाओं ने इन धाराओं में कई उल्लेखनीय संशोधन और सुधार किए हैं। दुनिया भर की तकरीबन 10 प्रतिशत आबादी किसी न किसी तरह की अपंगता से ग्रस्त है। इनमें से ज्यादातर लोग विकासशील देशों में रहते हैं। अपंग व्यक्ति दुनिया के निर्धनतम लोग हौं और वह अत्यंत संवेदनशील एवं खतरनाक परिस्थितियों में जीवनयापन करते हैं। गरीबी का अर्थ सिर्फ इतना ही नहीं है कि उनके पास भोजन, घर और आय का निश्चित स्त्रोत नहीं होता बल्कि इसका आशय यह भी है कि ऐसा व्यक्ति राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियों को प्रभावित नहीं कर सकता। शिक्षा और सूचनाओं का अभाव भी गरीबी का ही एक महत्वपूर्ण दुष्परिणाम होत है। अपंग व्यक्तियों को नाना प्रकार के भेदभावों का सामना करना पड़ता है। अपंगता के बारे में नकारात्मक रवैया और गलतफहमियों इसका एक प्रमुख कारण है। अपंग व्यक्तियों की संभावनाओं को साकार करने के लिए आवश्यक राजनीति इच्छाशक्ति का अभाव इसका एक और कारण है। इन भेदभावों के चलते अपंग व्यक्ति को सामाजिक विकास की प्रक्रिया से बाहर धकेल दिया जाता है और आमतौर पर इसके साथ ही वह सामाजिक रूप से भी बेदखल हो जाता है। पिछले कई वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय अपंग आंदोलन व्यक्तियों के मानवाधिकारों को मान्यता दिलाने के लिए काम कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों से इस सवाल पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भी चर्चा हो चुकी है परंतु अपंग व्यक्तियों को अपने मानवाधिकार अभी भी पूरी तरह नहीं मिल पाए हैं। बहरहाल इस विकलांगिता दिवस पर यह संकल्प लेने की जरूरत है कि इनके लिए किया गया पूरे प्रावधान को पूरा किया जा सके।

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